भारत में बांग्लादेशी शरणार्थियों से जुड़े प्रमुख मुद्दो का एक अध्ययन (छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले के विषेष सदंर्भ में)

 

डाॅ. एल. एस. गजपाल1, राम नरेश टण्डन2

1एसोसिएट प्राध्यापक, समाजशास्त्र एवं समाजकार्य अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (..)

2सहायक प्राध्यापक (समाजशास्त्र), शा. महाविद्यालय, नंदिनी अहिवारा (..)

 

अध्ययन मुख्य रूप से इस बिन्दु पर केन्द्रित रहा है कि बांग्लादेश में हुए साम्प्रदायिक दंगे और 1971 में बांग्लादेश के विभाजन के समय जिन शरणार्थीयों को भारत सरकार के द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य में शरणार्थी शिविरों में बसाया गया ये शरणार्थी देश तथा राज्य की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था, स्थानीय समुदाय जनजाति संस्कृति की दृष्टि से किसी भी प्रकार से समस्यामूलक हो नहीं है? इन्हीं तथ्यों का परीक्षण शोध अध्ययन के माध्यम से किया गया है। शोध को व्यवस्थित रूप देने के लिए बांग्लादेशी शरणार्थियों के गैर श्वििरार्थी शरणार्थी जो कि कांकेर जिले के पखांजूर में निवासरत हैं उन्हें लिया गया है।

 

 

 

 

अवांछित प्रवास सम्पूर्ण विश्व की ज्वलंत समस्याओं में से एक है। जब कभी भी व्यक्ति धार्मिक, राजनीतिक बाधाओं, युद्ध, आतंकवादी गतिविधियों, साम्प्रदायिक संघर्षाें तथा निर्भयता के चलते अपने जीवन को जोखिम में डालकर बेहतर जीवन के लिए प्रवास करता है तो ऐसी गतिविधियाँ लोगों को पड़ोसी देशों की ओर ले जाकर शरणार्थियों के रूप में खड़ा कर देती है, तब यह प्रवास कई मायनों में समस्या-मूलक होता है।

 

युगों से मानव द्वारा पलायन किये जाते रहे हैं। इस प्रकार बड़ी संख्या में लोगों का अंतर्राष्ट्रीय पलायन धार्मिक, राजनीतिक तथा जातियता के आधार पर हुआ।

 

साधारणतः अंतर्राष्ट्रीय पलायन (प्रवास) निर्धन देषों से धनी देशों की ओर हुआ है। इस सदी का सबसे प्रमुख लोक-प्रवास जो दक्षिण-एशिया के भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ, जब भारतीय गणराज्य का विभाजन सन् 1947 में एक पृथक राष्ट्र पाकिस्तान के रूप में हुआ, जिसके चलते अनुमानतः 7 मिलियन लोग भारत से पाकिस्तान और लगभग 8 मिलियन लोग पाकिस्तान से भारत पलायन करके एक-दूसरे देशों में गये, जो आज भी दोनों देशों के लिए एक प्रमुख समस्या बना हुआ है।1

अदस्तावेजित पलायन का मुद्दा आज विश्व की ज्वलंत समस्या है। जब भी मानवीय मतभेद, स्थानीय विवाद या गरीबी का प्रश्न उठता हैं तो लोग जीवन की बाजी लगाकर पारिवारिक बंधनों, आश्रय, भाषा, संस्कृति एवं बेहतर जिंदगी की खोज करती है। सन् 1947 में बंगाल का विभाजन विश्व इतिहास में सबसे विभाजन था। जहाँ घर के सोने का कमरा पश्चिमी बंगाल की सीमा के अन्दर था और रसोई घर सीमा के दूसरी ओर था। जिससे अनाधिकृत पूर्वी पाकिस्तान से भारत में बहुसंख्यक पलायन हुआ। (प्रणती दत्ता: 2004)2

 

इस आधार पर हम कह सकते हंै कि भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले बांग्लादेशी शरणार्थियों तथा उनका भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक आर्थिक परिवेश पर पड़ने वाला प्रभाव अध्ययन की दृष्टि से सम-सामायिक है। अतः प्रस्तुत समाजशास्त्री अनुसंधान हेतु बांग्लादेशी शरणार्थियों का चयन किया गया है।

 

बांग्लादेशी शरणार्थियों का इतिहास

बंाग्लादेश, बंाग्लादेशीय लोगों का मूल स्थान है। वह बंगाली, संस्कृति के विरासत का केन्द्र है। जिसे एक दीर्घ और दुखदायी शासन पहले अंग्रेजों और फिर पाकिस्तानियों से आजाद कराया गया था। भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बांग्लादेश बहुसंख्यात्मक विस्तृत बंगाल का भाग था, जो आज पश्चिम बंगाल राज्य है। 1947 से 1971 तक बांग्लादेश का क्षेत्र पाकिस्तान का एक भाग था, इस तरह उसका अधिकारिक पदनाम पूर्वी बंगाल के स्थान पर पूर्वी पाकिस्तान था। बांग्लादेश (बंगाली राष्ट्र के लिए बंगाली नाम) और उसकी आजादी 16 दिसम्बर 1971 को सुनिश्चित की गई। जबकि क्षेत्र में पाकिस्तानी सेनाओं ने बंगलादेशी ओैर भारतीय सेना की संयुक्त कमान के आगे समर्पण किया। बांग्लादेश विश्व में लगभग 1,44,000 वर्ग के क्षेत्र के साथ सबसे निर्धन क्षेत्रों में से एक हैं। 1947 से बांग्लादेश में हिन्दू जनसंख्या 30 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत रह गई है क्योंकि उन्हें भयंकर धार्मिक और राजनैतिक आतंकवाद से पीड़ित होना पड़ा। 1947 में विभाजन के तुरन्त ही बाद शरणार्थियों का बहुसंख्यक पलायन शुरू हुआ और बाद मेें सभी अवैध पलायनों को भी शासन ने वैध मान लिया।

 

 

भारत बांग्लादेश के साथ 4,095 किमी लम्बी सीमा अपने सभी पड़ोसियों के साथ सहभागिता करता हैं। इनमें से चार उत्तर-पूर्वी राज्यों-त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम और आसाम ही 1,879 किमी में हैं जबकि पश्चिमी बंगाल के पूर्वी राज्यों में 2,216 किमी लम्बी सीमा हैं। लगभग 65 किमी का क्षेत्र अभी भी निर्धारित नहीं हैं। पैरा-मिलिट्री, बी.एस.एफ. (सीमा सुरक्षा बल) जिसे सीमा पर नियुक्त किया।वे भी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। जिनमें बांग्लादेश से अवैध पलायन और सशस्त्र अलगाववादियों के हरकतों से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और पश्चिमी बंगाल पीड़ित हंै। (हुसैन: 2003)3

 

भारत बांग्लादेश की सीमा पर कटिले तारों के द्वारा सुरक्षा सीमा (बाड़) बनाने का काम प्रगति पर हैं। भारत-बांग्लादेश संधि के अनुसार कोई भी देश शून्य सीमा से 150 गज की दूरी तक बाड़ लगा सकता है। लगभग 3,500 ग्रामीण इस सीमा शून्य भाग पर रहते हैं और खेती करतें हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जब एक बार सीमा इन लोगों के रहने के क्षेत्र में आती है तब उनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगता है। (गांगुली:1999)4

 

अदस्तावेजित पलायन बांग्लादेश के सीमा से पष्चिम बंगाल के जिलों के लिए चिन्ता का विषय बन गया। जिससे सीमा क्षेत्र में असामाजिक गतिविधियाॅं सामान्य जीवन में बाधा डालने लगीं और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई। पश्चिम बंगाल सीमा क्षेत्र के नादिया जिले में रह रहे हिन्दू परिवारों को दो बार स्थानान्तरित किया गया-एक बार विभाजन के कारण, दूसरी बार आंतकवाद के कारण। मुस्लिम अवैध पलायनकर्ताओं के आतंक के कारण स्थानान्तरितों में साम्प्रदायिक समरसता पनप गई थी। ये घुसपैठिये शक्कर, दवाईयाॅ, सोना आदि का तस्करी करने में व्यस्त थे। इन सीमा क्षेत्रों में पशुओं की चोरी एक बहुत सामान्य सी बात थीं।(बेनर्जी: 2003)5

 

शरणार्थी समस्या तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था

अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अन्तर्गत शरणार्थीयो को विशेष स्थिति प्रदान की गई है, इस सम्बन्ध मे 1951 का अन्तराष्ट्रीय शरणार्थी अभिसमय तथा 1967 में स्वीकृत इस अभिसमय का प्रोटोकाल उल्लेखनीय है, अभिसमय के अनुसार, ‘‘शरणार्थी वह व्यक्ति है, जो अपनी प्रजाति, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्यता अथवा अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के कारण अपने देश में परिस्थितियों के आलोक में बसद में उक्त परिभाषा का विस्तार करते हुए उन व्यक्तियो को भी शरणार्थी माना गया है, जो अपने देश में सशस्त्र संघर्ष, आन्तरिक विद्रोह अथवा मानवधिकारों के व्यवस्थाजन्य उल्लंघन के कारण अपना देश छोड़कर दूसरे देश में पलायन करने के लिए विवश हो जाते है। (प्रतियोगिता दर्पण नवंबर 2015)6

 

उल्लेखनीय है कानून कि प्रवासी तथा शरणार्थी मे अन्तर होता है, प्रथम प्रवासी ऐसा कोई भी व्यक्ति होता है जो स्वेच्छा से बेहतर भविष्य की तलाश में अपना देश छोड़कर दूसरे देश में निवास करने लगता है, जबकि शरणार्थी विवश होकर विपरीत परिस्थितियों में दूसरे देश पलायन करता है, दूसरे, प्रवासी की कानूनी स्थिति का निर्धारण उस देश के कानूनों के अनुसार होता है जिस देश में वह निवास करने के लिए जाता है, जबकि शरणार्थी को अंतराष्ट्रीय कानून के अंतर्गतविधिक स्थिति प्राप्त होती है तथा उन्हे कतिपय विशिष्ट अधिकार सुविधाएं प्राप्त होती है, ये विशेष अधिकार है- उस देश में जहाॅ उनका उत्पीडन होने की संम्भावना है वहाॅ उन्हे वापस भेजने पर रोक: बिना किसी भेदभाव के उनकें आधारभूत मानवीय इस प्रकार के अधिकर प्राप्त नही होते है। (प्रतियोगिता दर्पण नवंबर 2015)7

 

वर्तमान शरणार्थी समस्या में यह अन्तर महत्वपूर्ण है क्योकि कतिपय यूरोपियन देश इसेप्रवासी समस्याका नाम दे रहे है, ताकि वे शरणार्थियों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों से मुक्त हो सकें, जबकि वस्तुतः यह एक शरणार्थी समस्या है तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अन्तर्गत शरणार्थियों को कतिपय अधिकार प्राप्त है, उसी अनुपात में शरणार्थियों के प्रति प्रत्येक देश के कतिपय कानूनी दायित्व भी होतें है।

 

यूएनएचसीआर:

‘‘यूनाईटेड नेशन्स हाई कमीशनर फाॅर रिफ्यूजी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शरणार्थियों की देखभाल के लिए शीर्ष संस्था है, इसकी स्थापना 1950 में यूएनओं की महासभा द्वारा की गई थी, इसका मुख्यालय जेनेवा में है, वर्तमान में यह संस्था 125 देशों में 33.9 मिलियन शरणार्थियों की देखभाल कर रही है, इस संस्था का मुख्य वित्तीय स्त्रोत सदस्य देशांे द्वारा दिया गया योगदान है. वर्तमान में यह संस्था वित्तीय साधनों की शारी कमी का सामना कर रही है।’’ (यूएनएचसीआर: 2015)8

 

क्रियात्मक अवधारणा-

प्रस्तुत शोध अध्ययन हेतु प्रमुख क्रियात्मक अवधारणा निम्न है: -

 

बांग्लादेषी शरणार्थी -

प्रस्तुत अध्ययन में बांग्लादेशी शरणार्थी से आशय ऐसे व्यक्तियों से हैं जो कि बांग्लादेष के साम्प्रदायिक दंगों एवं 1971 विभाजन के समय छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न स्थानों पर शरणार्थी के रूप में बसाया गया है। इनका नाम शरणार्थियों की सूची में आज भी शामिल हैं। जबकि अधिकांष शरणार्थियों को सरकार द्वारा विस्थापित कर भारतीय नागरिकता प्रदान की जा चुकी है।

 

अध्ययन का समाजशास्त्रीय महत्व -

सीमाओं के पार नागरिकों का एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में प्रवेश विवाद का एक गंभीर विषय रहा है। दीर्घावधि से कुछ समाजषास्त्री और मानव-शास्त्री, साथ ही अर्थशास्त्रियों ने घुसपैठ की समस्या का अध्ययन किया है, वह भी जनसांख्यिक बदलाव धार्मिकता, नस्लवाद और राजनैतिक चरित्र-मेजबान देश के संदर्भ में किया। फिर भी जब अन्तर-सीमा पार करने के प्रवाह का प्रभाव क्षेत्रीय रूप से राष्ट्र के सिद्धान्त के साथ जोड़ा नहीं गया। यह राष्ट्र ही है कि उसके नागरिक कौन है? राष्ट्र ही सुनिश्चित करता है कि सीमा को वहाॅ तक सींचा जा सकता हैं, वे सभी लोगों जिनका दायित्व राष्ट्र पर है, दोनों राष्ट्र और नागरिकता के योग्य बन जाते हंै। नागरिकता राष्ट्रीय सीमा में सुरक्षा का पासपोर्ट बन जाती है। आव्रजन नागरिकता की माॅग व्यवहार करने योग्य बनने के लिए और एक नए राष्ट्र की स्थापना के लिए किए जाने वाली जनतांत्रिक प्रयासों से अपना सहयोग देने के लिए अन्यथा असुरक्षा उनमें घर कर जाती है।

 

सरकार द्वारा उन विस्थापित परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य,आवास एवं अन्य मूलभूत सुविधाएं प्रदान की जा रही है। वह उस समुदाय के समाजिक एवं आर्थिक जीवनस्तर को परिवर्तन करने में कितना सहभागी हो रहा है। यह अध्ययन के समाजशास्त्रीय महत्व को इंगित करता हंै। विस्थापित परिवारों की स्थानीय समाज से सामंजस्य स्थापित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा उन परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य आवास इत्यादि मूलभूत सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं। वह वास्तव में उस समुदाय के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन स्तर को बेहतर बनाने में कितना सहायक सिद्ध हुआ है ? प्रस्तुत अध्ययन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा सकती है कि अध्ययन के माध्यम से बाग्लादेश के सांप्रदायिक दंगों 1971 के विभाजन के बाद से लेकर अब तक भारत में रह रहे बांग्लादेशी शरणार्थियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति किस प्रकार की हैं? क्या वे स्थानीय समुदाय से अपना सामांजस्य स्थापित कर पाने में सफल रहे हैं? या स्थानीय समुदाय के साथ-साथ राज्य की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशीला विषय बन चुके हैं? इन सभी तथ्यों का ज्ञान अध्ययन के माध्यम से हुआ है जो कि इसके महत्व को दर्शाता है।

 

बांग्लादेशी शरणार्थियों से जुड़े प्रमुख मुद्दे -

1. गैर शिविरार्थियों से जुडे़ मुद्दे -

बांग्लादेशी शरणार्थी जिन्हें शरणार्थाी शिविर में कुछ वर्ष रहने के पश्चात गैर शिविरार्थी के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य के अलग-अलग जिलों (मुख्य रूप से जनजाति क्षेत्रों) में बसाया गया है, जिन्हें गैर शिविरार्थी के रूप में रहते हुए 40 वर्ष से भी अधिक समय हो चुका है, उनसे जुड़े कुछ प्रमुख मुद्दे इस प्रकार है -

 

;प्द्ध    स्थानीय आदिवासियों पर दबाव -

चूंकि बांग्लादेशी शरणार्थियों को जब राज्य में बसाया गया तो वे सामाजिक आर्थिक शैक्षणिक दृष्टि से स्थानिय आदिवासियों से भिन्न होने के साथ-साथ बेहतर स्थिति में थे। बसने के पश्चात शासन की ओर से शरणार्थियों को आवास, कृषि भूमि, बैलजोड़ा, अनाज जैसी सुविधाएं निःशुल्क दिया जा रहा था। वहीं दूसरी ओर राज्य की जनजातियों को इस प्रकार की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती थी परिणामतः बांग्लादेशी शरणार्णी संगठित होकर स्थानीय जनजातियों पर दबाव बनाने लगे और आज स्थिति यह है कि स्थानीय पंचायत में यदि मुखिया आदिवासी है तब भी नेतृत्व बांग्लादेशी शरणार्थियों के हाथ में है वे दबाव बनाकर अपने अनुरूप निर्णय करा लेते हैं। इस विषय में दखल दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता ळें

 

;प्प्द्ध स्थानीय आदिवासियों का शोषण -

जनजाति क्षेत्रों में बाह्य समूहों के द्वारा किए जाने वाले शोषण के विविध पक्ष हैं जिसमें बांग्लादेशी शरणार्थी भी एक पक्ष हैं। बांग्लादेशी शरणार्थियों के द्वारा स्थानीय आदिवासियों पर दबाव बनाकर उनकी जमीन हड़पने, श्रम कराकर उचित परिश्रमिक प्रदान नहीं करना जैसी घटनाएं होती है। बैंक (कृषि विकास विभाग) के अधिकारी से चर्चा करने पर उन्होने बताया कि पखांजूर में पूरा वर्चस्व चाहे बैंक में लेन देन, व्यापार अन्य कोई व्यावसायिक गतिविधियां हो, ऋण लेना, लधुव्यवसाय हेतु लोन, समूह बनाकर गतिविधि करना इन सभी में बांग्लादेशी शरणार्थि आगे हैं। इसका कारण प्रारंभ से ही उन्हें सरकारी दामाद की तरह सुविधा मुहैय्या कराना और जनजातियों हो हाॅसिए पर रखना रहा है। यदि 1975 के पश्चात बांग्लादेशी शरणार्थियों को विस्थापित करने के समय स्थानीय आदिवासियों के हितों की रक्षा किया जाता तो आज इतनी खराब स्थिति क्षेत्र की जनजातियों की नहीं होती है।

 

स्थानीय आदिवासी आज अपने ही घर में बांग्लादेशी शरणार्थियों के प्रभाव के चलते स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में स्थानीय जनजातियों के हितों की रक्षा सरकार के माध्यम से किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है।

 

;प्प्प्द्ध आदिवासी क्षेत्रों में जमीन से जुड़े मुद्दें-

तथ्य संकलन के दौरान जनजाति क्षेत्रों में जमीन से जुड़़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे का ज्ञान हुआ। चूंकि केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकार के द्वारा कानून बना दिए जाने के कारण गैर आदिवासी, आदिवासियों की जमीन खरीद नहीं सकता और ना ही आदिवासी भी किसी गैर आदिवासी को अपनी जमीन बेच सकता है। बांग्लादेशी शरणार्थियों ने इसका भी हल निकाल लिया है। लंबे समय से बसे होने के कारण स्थानीय जनजाति महिला को प्रेमजाल में फसाकर या प्रलोभन देकर अपने पुत्र से विवाह कराने के पश्चात उनके नाम पर जमीन लेकर कृषि कार्य कर रहे हैं। चूंकि बांग्लादेशी शरणार्थियों की आर्थिक स्थिति प्रारंभ से ही जनजातियों से बेहतर रही है ऐसे में 15-20 वर्षों के बाद वे और भी सम्पन्न हो गये और अपने कूटनीतिक तरीके से क्रय किए गये जमीन पर कृषि करते-करते आज आर्थिक रूप से और भी बेहतर स्थिति में है।

 

यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि कई वैवाहिक संबंध 05-10 वर्षों में ही टूट गये पर जमीन पर मालिकाना हक अभी भी शरणार्थी परिवारों के पास हैं। यह मुद्दा गंभीर है जिस पर ध्यान दिया जाना नितांत आवश्यक प्रतीत होता है।

 

;प्टद्ध वोट बैंक की राजनीति का मुद्दा -

राष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों को वोट बैंक की राजनीति के चलते मतदाता बनाए जाने का मुद्दा बेहद गंभीर रूप ले चुका है। आंकड़े यह बताते हैं कि पश्चिम बंगाल के 292 विधानसभा क्षेत्रों में से 52 क्षेत्रों में अवैध धुसपैठिए चुनाव परिणाम को तय करते हैं। इसी प्रकार असम की 126 में से 40 सीटों पर अवैध बांग्लादेशी कुसयैठिए मतदाता परिणाम को प्रभावित करते हैं। ऐसी स्थिति में जिन-जिन राज्यों में बांग्लादेशी श्रणार्थियों को बसाया गया है उनका समय-समय पर जांच हो कि वे अपने साथ किसी अवैध बांग्लादेशी नागरिक को साथ में रखे तो नहीं हैं और उन्हें वोट बैंक के राजनीति के चलते मतदाता तो नहीं बना दिया गया।

 

छत्तीसगढ़ राज्य और अध्ययन क्षेत्र में स्थिति उतनी चिंताजनक नहीं है पर गंभीर बन सकती है यदि समय रहते विस्थापित बांग्लादेशी शरणार्थियों की गतिविधियों पर निगरानी नहीं रखा गया, स्थानीय चुनाव में, व्यापार में उनके वर्चस्व पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो आगे समस्या खड़ी हो सकती है। हम इस सत्य को स्वीकारे या नकार दें कि आसम और पश्चिम बंगाल के शरणार्थियों के पाकिस्तान बांग्लादेश के प्रति प्रेम किसी से छिपा नहीं है साथ वे ऐसी हिंसक गतिविधियों में लिप्त पाये गये हैं जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है। ऐसे में राज्य सरकार को भी चाहिए कि समय पूर्व स्थानीय बांग्लादेशी शरणार्थियों की गतिविधियों पर नजर रखें।

 

;टद्ध घटती जनजाति आबादी -

बांग्लादेशी शरणार्थियों के विस्थापन से स्थानीय समुदाय की जनांकिकी में बदलाव देखा गया है। मुख्य रूप से बांग्लादेशी शरणार्थियों को जनजाति क्षेत्रों में बसाया गया है। जहां पर अब धीरे-धीरे शरणार्थियों की जनसंख्या में वृद्धि और जनजाति जनसंख्या में कमी हो रही है। इसे हम त्रिपुरा राज्य के उदाहरण से भी समझ सकते हैं जहां पर 1941 में जनजाति आबादी का प्रतिशत 53.16 था जो कि 2011 की स्थिति में 25 प्रतिशत रह गयी है अर्थात 70 वर्षों में जनजाति आवादी लगभग 55 प्रतिशत कम हो गयी हैं ऐसी स्थिति में इन क्षेत्रों मं जनजातियों के अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है।

 

छत्तीसगढ़ राज्य में स्थिति तुलनात्मक रूप से भयावह नहीं है लेकिन बाह्य समूह के बढ़ते प्रभाव और शरणार्थियों की बढ़ती जनसंख्या से कुछ दशक में स्थिति भिन्न हो सकती है जिससे जनांकिकी परिवर्तन संरचनात्मक परिवर्तन भी संभव है ऐसी स्थिति में जो राज्य जनजाति राज्य के नाम से जाना जाता है वह इस श्रेणी से बाहर हो सकता है। ऐसे में इस स्थिति से बचने के लिए प्रयास अभी से करने होेंगे।

 

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प्रतियोगिता दर्पण, नवबंर 2015 पृ. 75

प्रतियोगिता दर्पण, नवबंर 2015 पृ. 76

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Received on 09.01.2019            Modified on 12.02.2019

Accepted on 22.04.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):560-564.